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Excerpt for 15 लाख की लीगल नोटिस by , available in its entirety at Smashwords







15 लाख की लीगल नोटिस







आलोक श्रीवास्तव









© Alok Srivastava, 2019

प्रथम संस्करण: 2019

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प्रस्तावना



मेरे जीवन में घटित हुयी इन घटनाओं, जिन्हें निजी याददाश्त के लिए मैंने दर्ज कर रखा था, को मैं कभी शायद आपके सामने न रखता और ये सारी बातें समय के गुमनाम अंधेरों में कहीं खो जातीं लेकिन अब हालात ऐसे हो गये हैं कि यदि मैं इन्हें आपके सामने नहीं रखता हूँ तो शायद इन्हें बताने के लिए मैं जीवित न रहूँ। जीवन पर आये इस खतरे को देखते हुए मुझे लगता है कल को यदि मैं और मेरे परिवारजन जीवित नहीं बचते हैं तो उस स्थिति में भी आप उस सच्चाई को देख और समझ सकें जिसे आपसे छिपाने की कोशिश की जा रही है।



आलोक श्रीवास्तव

16 जनवरी, 2019















15 लाख की लीगल नोटिस



यदि कभी आपने इतिहास को दिलचस्पी के साथ पढ़ा होगा तो आपने महसूस किया होगा कि लिखे जाने वाले हर इतिहास में किसी राजा या बादशाह, नेता आदि का और उनकी उपलब्धियों का ही जिक्र देखने और पढ़ने को मिलता है न कि उनके काले कारनामों और ऐसे कृत्यों का जिनसे देश या समाज को अपूर्णनीय क्षति होती है। जबकि शासकों और नेताओं के काले कारनामों अथवा गलत कामों का इतिहास में ब्यौरेवार वर्णन किया जाना चाहिए ताकि यदि उनके उस किये गये गलत काम का दीर्घकाल में कोई हानिकारक परिणाम हो तो आने वाली पीढ़ी को यह तो पता रहे कि वह जिस हानिकर परिणाम को भुगत रही है उसके पीछे वास्तव में कौन शासक या नेता जिम्मेदार था और यह कि क्या तत्कालीन बाकी नेताओं ने अपनी तरफ से उस गलत काम को घटित होने से रोकने की वास्तविक कोशिश भी की थी या फिर अपनी मौन सहमति देकर वे भी उस शासक या नेता के गलत काम के भागीदार थे और झूठ-मूठ ही यह दिखाने का दावा कर रहे थे कि उनकी सोच उस गलत काम करने वाले नेता से भिन्न थी।

काले कारनामों के इतिहास में दर्ज किये जाने का भय यदि शासक या नेता में होगा तो इस भय के कारण वह कोई भी ऐसा ऊँटपटांग काम नहीं करेगा जिससे देश और समाज को हानि पहुंचे और देश की जनता को वह अनावश्यक कष्ट उठाना पड़े जो उस पर उसके शासक अथवा नेता की वजह से थोपा गया है।

इतिहास में इन सारी बातों को यथातथ्य इसलिए भी लिखा जाना चाहिए ताकि यदि वैसी परिस्थितियां, जो अतीत में घट चुकी हैं, दुबारा आती हैं तो उनसे निपटने के लिए हम भावी रूप से तैयार हो सकें।

खैर, अब यह व्याख्यान न देते हुए कि इतिहास को किस प्रकार से लिखा जाए मैं सीधे उन तथ्यों और घटनाओं की तरफ आता हूँ जो इतिहास बन गयी हैं। यहाँ मैं भारत के इतिहास से जुड़ी उस सच्चाई को लिख रहा हूँ जो भारत के हर आम नागरिक से जुड़ी है और यह भारतीय इतिहास के उस दौर को बताती हैं जिसमें न केवल हर आम भारतीय बुरी तरह से परेशान था और बल्कि पशु पक्षियों तक के बुरे दिन आ गये थे। यह वह दौर था जब एक जबरदस्त मानसिक और शारीरिक यन्त्रणा झेलने के लिए हम सभी आम भारतीयों को मजबूर कर दिया गया था।

मैं बात कर रहा हूँ नवम्बर 2016 की, जिसे आप भूले नहीं होंगे, यह वह महीना था जिसकी आठ तारीख यानि 8 नवम्बर 2016 की रात 8 बजे, भारत देश में नोटबंदी किये जाने की घोषणा की गयी थी। देश में की गयी इस नोटबंदी के बाद से जिन मुश्किलों का सामना मैंने किया था उनके बारे में मैं यही मानता हूँ कि उन मुश्किलों से शायद ही इस देश में रहने वाला कोई भी आम नागरिक अछूता रहा हो। बहुत संभव है कि 8 नवम्बर 2016 को देश में हुयी नोटबंदी के कटु अनुभव को आपने खुद भी सहा हो। इस नोटबंदी की घोषणा के जरिये देश में प्रचलित 500 और 1000 रूपये के बैंक नोटों का लीगल टेंडर अचानक ही खत्म कर दिया गया था। और इसे करने के पीछे यह दलील दी गयी थी कि देशहित में ऐसा करना आवश्यक था ताकि देश में छिपे काले धन को बाहर निकाला जा सके।

नोटबंदी किये जाने के बाद, पूरे देश में हड़कम्प का माहौल और अस्त-व्यस्तता साफ़ नजर आई, और सारे अख़बार और न्यूज चैनलों पर नोटबंदी ही एक मात्र चर्चा का मुद्दा थी। पर देश में की गयी यह नोटबंदी मात्र चर्चा का विषय नहीं थी बल्कि यह देश की जनता पर नरेंद्र-मोदी[1] द्वारा थोपा वह मानसिक उत्पीड़न और शारीरिक कष्ट था जिसे मैंने और मेरे परिवार के लोगों ने देश की बाकी आम जनता की भांति ही सहा था। ठंड के मौसम में अपने पुराने 500 और 1000 रूपये के बैंक नोट बदलने और बैंक से पैसे निकालने के लिए घंटों बैंकों की लाइन में खड़ा होना, बैंक से अपने ही पैसों को वापस अपने घर पर लाना किसी किले को फतह करने से कम ख़ुशी देने वाला अहसास नहीं था।

खैर, नोटबंदी के किये जाने से देश की गति जरूर थम गयी थी लेकिन वक्त अपनी गति से चलता रहा और सात महीने बीत गये। इस गुजरे वक्त ने नरेंद्र-मोदी द्वारा किये गये नोटबंदी के वज्रप्रहार से घायल हुए इस देश के जख्म को भरना शुरू ही किया था कि नरेंद्र मोदी और उसके साथियों ने एक बार फिर से देश को संकटपूर्ण स्थिति में डालने के लिए 16.06.2017 अख़बारों में खबर छपवा दी: “सरकार ने बैंक में नये खाता खोलने के लिए आधार को अनिवार्य बना दिया है। और पुराने बैंक खातों को 31 दिसम्बर 2017 से पहले आधार से जोड़ना अनिवार्य है अन्यथा सारे खातों को अविधिमान्य घोषित कर दिया जाएगा” और इसके बाद हमारे मोबाइलों पर बैंकों के किसी रीजनल अधिकारी की तरफ से यह संदेश आने लगे थे कि अपने बैंक खातों को आधार से जुड़वाना अनिवार्य है।

नरेंद्र मोदी ने अपने सहयोगियों अरुण-जेटली[2] और उर्जित-पटेल[3] के साथ मिलकर, अविधिक ढंग से 500 और 1000 रूपये के नोटों का लीगल टेंडर खत्म कर जनता के खुद के जमा किये पैसों को कालाधन बता कर किस प्रकार से सेंधमारी की थी और जनता को परेशान किया था, यह बात हम लोग भूले नहीं थे और इसके साथ ही हम लोगों को यह बात भी पता थी कि बैंक खातों से आधार का जुड़वाना सुरक्षित है अथवा नहीं इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में विचारण अभी चल रहा था, न्यायालय में वाद के लम्बित रहने के दौरान अख़बार में आई यह खबर कि सरकार ने बैंक में नये खाता खोलने के लिए आधार को अनिवार्य बना दिया है। और पुराने बैंक खातों को 31 दिसम्बर 2017 से पहले आधार से जोड़ना अनिवार्य है अन्यथा सारे खातों को अविधिमान्य घोषित कर दिया जाएगा। और साथ ही यह भी कि बैंक के किसी रीजनल अधिकारी के जरिये लगातार मोबाइल पर यह संदेश भेजा जाना कि बैंक खातों को आधार से जुड़वाना अनिवार्य है, इस बात को साफ़ जाहिर करते थे कि नरेंद्र मोदी और उसके सहयोगियों की नीयत और इरादे ठीक नहीं हैं। इसलिए हम लोग आधार की विश्वसनीयता को लेकर सतर्क हो गये और इस बात की प्रतीक्षा करने लगे कि सुप्रीम कोर्ट आधार मामले पर कुछ कहे ताकि हम यह तय कर सकें कि हम अपने आधार को बैंक खातों से जुड़वाएं अथवा नहीं। हम अभी ऊहापोह की स्थिति में थे कि इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने आधार मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि वह अभी केवल पैन कार्ड को आधार से जोड़े जाने के लिए अपनी सहमति दे सकती है और यह कह सकती है कि पैन कार्ड से आधार को जुड़वाना जरूरी है। लेकिन बैंक खातों से आधार को जोड़ने के बारे में न्यायालय का अंतिम फैसला आना अभी बाकी था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद मैंने अपने और अपने परिवार के सभी सदस्यों के, पैन कार्ड को आधार से जोड़ दिया था, ताकि भविष्य में हमें किसी प्रकार की मानसिक पीड़ा और अनावश्यक कष्ट न सहना पड़े।

लेकिन मेरा ऐसा सोचना उस दिन गलत साबित हुआ जब 30 जून 2017 को मैं बैंक में अपने चेक के भुगतान को प्राप्त करने के लिए गया था। वहां काउन्टर पर उपलब्ध बैंक कर्मी ने चेक पर कोई संख्या लिखते हुए मुझसे पूछा, “क्या आपका बैंक अकाउंट आधार से जुड़ा है?”

मैंने जवाब दिया, “नहीं, लेकिन मेरा पैन नम्बर आधार से जुड़ा है।”

मेरा जवाब सुनकर बैंककर्मी ने कहा, “केवल पैन नम्बर जुड़वाना ही काफी नहीं है, अकाउंट के आधार से जुड़े बिना आप अपना पैसा कैश नहीं करा सकते हैं, इसलिए पहले आप अपने बैंक अकाउंट को आधार से जुड़वायें उसके बाद ही आप अपना पैसा बैंक से निकाल पाएंगे अन्यथा नहीं।”

परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने तो केवल पैन को ही आधार से जोड़ने की बात कही है न कि बैंक अकाउंट को?” मैंने कहा।

आप मुझसे बेकार बहस कर रहे हैं जब तक आप अपने आधार नम्बर को बैंक के बचत खाते से नहीं जोड़ेंगे तब तक भुगतान संभव नहीं है।” बैंक कर्मी ने कहा।

बैंककर्मी द्वारा मेरे चेक का भुगतान करने से इनकार किये जाने के कारण मुझे अपने चेक को मजबूरन कैंसिल कराना पड़ा। इसके बाद मैं बैंक मैनेजर के केबिन में गया और अपने चेक के कैंसिल होने की वजह उसे बताई तो मेरी बात सुनकर बैंक मैनेजर बोला “वह ऐसा ‘रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया’ की गाइड लाइन पर कर रहे हैं।”

जब मैंने बैंक मैनेजर से ‘रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया’ की वह गाइड लाइन दिखाने की बात की तो उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया।

इस पर मैंने बैंक मैनेजर को एक बार फिर से यह समझाने की कोशिश की सुप्रीम कोर्ट ने बैंक खातों को आधार से जोड़ने के लिए नहीं कहा है, कोर्ट ने केवल पैन कार्ड को आधार से जोड़ने की बात कही है और मैंने अपना और अपने घर के सभी लोगों का पैन नम्बर आधार नम्बर से जोड़ दिया है।

मेरी बात सुनकर बैंक मैनेजर भड़क गया और बोला, “मैं सुप्रीम कोर्ट को नहीं मानता हूँ, मुझे अपना अकाउंट नम्बर बताओ मैं अभी तुम्हारा खाता फ्रीज करता हूँ।” और साथ ही यह धमकी भी दी कि “बैंक के बाहर चलो मैं तुमसे वहीं निपटता हूँ।”

इस पर मैंने कहा “बैंक खाते और आधार को जोड़ने का प्रश्न सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। साथ ही सरकारी अधिसूचना के अनुसार 31 दिसम्बर तक बैंक खातों को आधार से जोड़ने की बात प्रस्तावित है।”

मेरे इतना कहने पर बैंक मैनेजर ने कहा, “हमारे पास 55,000 खाते हैं तो क्या हम सभी खातों को 31 दिसम्बर को जोड़ेंगे। यदि आज तुमने अपना खाता आधार से नहीं जोड़ा तो खाता बंद कर दिया जाएगा।”

बैंक मैनेजर की बात सुनकर मैं चुपचाप अपने घर लौट आया और अगले दिन यानि 1 जुलाई 2017 को मैंने बैंक मैनेजर द्वारा मेरे साथ किये गये दुर्व्यवहार और मेरे चेक के भुगतान से इनकार किये जाने की जानकारी कैंसिल हुए चेक की प्रति के साथ बैंकिग लोकपाल को भेज दी।

उसी दिन शाम को जब मैं अपने भाई के साथ बैठकर चाय पी रहा था तभी मेरे भाई ने यूं ही बात छेड़ते हुए कहा, “भाई मेरे ख्याल से उस बैंक मैनेजर ने सरकारी दबाव के कारण ही बैंक खाते को आधार से जोड़ने की बात की थी। वैसे भी हम लोगों के मोबाइलों पर किसी अंजान रीजनल अधिकारी की तरफ से बैंक खातों को आधार से जोड़ने के लिए संदेश आते रहते हैं।”

हो सकता है कि बैंक मैनेजर ने सरकारी दबाव के कारण ऐसा किया हो पर सरकार गैर-कानूनी तरीके से इस तरह से जोर जबरदस्ती नहीं कर सकती है, खैर जो भी हो इस बारे में मैंने बैंकिंग लोकपाल से शिकायत कर दी है उम्मीद करते हैं कि वह इस मामले में उचित कार्यवाही करेगा।” मैंने लापरवाही से कहा।

भाई लगता है, तुम भूल रहे हो अभी पिछले साल 8 नवम्बर 2016 को इस देश में जो नोटबंदी हुयी थी वह भी पूरी तरह से गैर-कानूनी थी, जिसे नरेंद्र मोदी ने, अपने साथियों अरुण जेटली और उर्जित पटेल के साथ मिल कर अंजाम दिया था और मैंने अपने 13 नवम्बर 2016 वीडियो[4] के जरिये नरेंद्र मोदी, उर्जित पटेल और ख़ासकर अरुण जेटली को संबोधित करते हुए इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट पढ़कर प्रॉमिस, एग्रीमेंट और कॉन्ट्रैक्ट क्या होता है यह बताया था और उन्हें यह समझाने की कोशिश की थी कि नोट पर रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं और नोट पर लिखी राशि के भुगतान के लिए वह वचन देकर बाध्य होता है और यह कि किस प्रकार से वचनभंग करके यह लोग एक विधिक करार, जो संविदा था, को अविधिमान्य कर जनता से फ्रॉड कर रहे हैं। जिसके लिए उन्हें शर्म आनी चाहिए थी और नैतिकता के नाम पर त्यागपत्र दे देना चाहिए था। लेकिन ये लोग तो चिकने घड़े हैं इन पर मेरी बातों का कोई असर हुआ था, वहीं जहाँ संसद के नेताओं को चाहिए था कि वे नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली और उर्जित पटेल से जवाब तलब कर उन्हें घेर लेते और इन तीनों को त्यागपत्र देने के लिए मजबूर कर देते और फिर नोटबंदी वापस ले ली जाती, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ उलटे उस समय नोटबंदी का देश के सारे नेता संसद में जिस तरह मजा ले रहे थे उसे देखकर लगता था मानो वे खुद भी इस नोटबंदी के किये जाने के पीछे शामिल थे, क्या वह सारी बातें तुम भूल गये हो। मैं गुमनाम रहते हुए यही चाहता था कि नोटबंदी को वापस ले लिया जाए और तुमने मेरी उस गुमनाम यू-ट्यूब वीडियो को अपने फेसबुक पेज की 13 नवम्बर की पोस्ट के जरिये शेयर किया था तो तुमने अपनी पोस्ट के जरिये कहा था कि “कई बन्धु एवं भाजपा कार्यकर्ता मेरे पूर्व सन्देश पर प्रश्न पूछ रहे हैं.... 500 एवं 1000 के नोटों पर मोदीजी का नियम क्यों नहीं चलना चाहिए....? उन सभी लोगों और #मोदीजी, #जेटलीजी एवं #RBIGovernor से अनुरोध है कि वे इस विडियो को अंत तक जरूर देखें....:

https://www.youtube.com/watch?v=cqE8ed81ayA

‘“हाँ मुझे याद है कि 14 नवम्बर 2016 को मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी थी जो इस प्रकार से थी: #मोदीजी, #जेटलीजी, कल एक भारत के नवयुवक ने आपकी #भारतीयसंविदाअधिनियम,1872 की क्लास ली। आज हम आपको #संविधान पढ़ाते हैं। गौर से पढ़िए:

‘"#कालेधन के नाम पर प्रतिव्यक्ति से जिस बचत किये हुए पैसे को ऐंठना चाहते हैं तथा उसके खुद के खाते से पैसे निकालते समय असंवैधानिक प्रतिबन्ध लगा दिए हैं उस विषय में आप जान लीजिये। प्रतिव्यक्ति कर #राज्य सूची (schedule VII List 2) का विषय है, जिसपर क़ानून अथवा कोई भी नियम बनाने से पहले आपको संसद के दोनों सदनों एवं देश के आधे से अधिक राज्यों की सहमति चाहिए होती है। और अंततः राष्ट्रपति की assent चाहिए होती है।

‘“आपने इसे असंवैधानिक तरीके से देश में लागू तो कर दिया है, पर संसद के दोनों सदनों और आधे से अधिक यानि 16 राज्यों की सहमति कहाँ है? आपने जो काम किया है वह संविधान का खुला उल्लंघन है। इसलिए आप दोनों त्यागपत्र दीजिये। संसद भंग कीजिए और देश में पुनः चुनाव करवाइए।" मैंने अपनी बात आगे कहते हुआ कहा, “तुमने जिस प्रकार से 13 नवम्बर 2016 के वीडियो में अपनी बात रखी थी उसमें तुमने वचन, करार और संविदा को भली भांति से स्पष्ट कर दिया था, नोट धारक को दिया गर्वनर का वचन है और पूरी तरह से विधिक रूप से प्रवर्तनीय है। ‘privy of contract’ के सिद्धांत (अर्थात संविदा से बाहर का व्यक्ति संविदा का पक्षकार नहीं होता है इसलिए वह उस संविदा में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है) से नोट पर दिए गये वचन से हुयी संविदा के पक्षकार केवल धारक और रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया का गवर्नर हैं ऐसे में संविदा से बाहर का व्यक्ति (नरेंद्र मोदी) बैंक नोट के धारक और रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया का गवर्नर के बीच हुयी संविदा में दखल नहीं दे सकता है परन्तु फिर भी उसने नोटबंदी कर अविधिक ढंग से 500 और 1000 रूपये के नोटों का लीगल टेंडर को तो खत्म ही कर दिया, जिसे करने की उसमें शक्ति नहीं थी।”

जानते हो भाई, काले धन के नाम पर 8 नवम्बर 2016 को की गयी नोटबंदी द्वारा 500 और 1000 रूपये के लीगल टेंडर को खत्म किये जाने के बाद देश और समाज का जितना समय और धन बर्बाद हुआ है इसकी भरपाई होने कितना समय लगेगा इसका हममें से कोई भी आदमी अंदाजा नहीं लगा सकता है। हम लोग खुद भी तो अपने ही पैसों को बैंक से निकालने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते थे। दिन के चार-पाँच घंटे तो बैंक में पुराने नोटों को जमा करने और नये नोट को निकालने में गुजर जाते थे। और बैंक से मिलने वाले 2000 के नोट का छुट्टा कराने के लिए कम से कम 200 या 300 रूपये का सामान न चाहते हुए भी हम लोगों ने खरीदा है। क्या तुम वह सब बातें भूल गये हो?”

मैं कुछ नहीं भूला हूँ, मेरे भाई, मुझे हर एक घटना अच्छी तरह से याद है कि नोटबंदी किये जाने के सदमे से कैसे गोरखपुर में एक धोबन की मौत हुयी थी, किस तरह से लोगों को 500 के बदले में 300 और 1000 रूपये के बदले में 700 रूपये देकर काला बाजारी की गयी थी, मुझे याद है किस तरह से राजनीतिक दलों के कार्यालयों में 35 प्रतिशत कटौती कर के पुराने 500 और 1000 रूपये के नोटों के बदले जाने की खबरें मीडिया में आ रही थीं। किस तरह से इस नोट बंदी में किसानों की जमीनों को हथियाया गया था; और तो और पार्क, तालाब, कब्रिस्तान, चरागाहों और सारी खाली जमीनों, जो पशु पक्षियों के लिये शरण स्थली थे, को इस नोट बंदी ने बर्बाद कर दिया। हमारा प्यारा उद्योग नगर मैदान, जहां पर शाम के समय अकसर हम टहलने जाया करते थे, हम लोगों से छिन गया। इस नोटबंदी ने इस देश के संसाधनों का जिस तरह से नाश किया है वैसा नाश होने में कम से कम बीसियों साल लगते। इस नोटबंदी ने बच्चों से उनके खेलने के मैदान और आवारा जानवरों से उनके सुस्ताने और पनाह लेने की जगहों को छीन लिया। नोटबंदी के बाद से चौड़ी गाड़ियों और कारों की संख्या में इतना ज्यादा इजाफा हुआ है कि इन गाड़ियों के आवागमन के लिए दो लेन की सड़कों को पहले चार लेन का किया और जब इससे भी कुछ नहीं हुआ तो सड़क चौड़ी करने के नाम पर सड़कों से वे फुटपाथ खत्म कर दिए गये, जिन पर पैदल-यात्री किसी समय चला करते थे और गरीब तबके के लोग अपनी दुकानें लगाया करते थे।

नोट बंदी के उस बुरे दौर की एक–एक घटना मुझे अच्छी तरह से याद है कि किस प्रकार से नोटबंदी से पूरे देश में अव्यवस्था फ़ैल गयी थी। नोटबंदी के इस फैसले ने तो घर की औरतों तक को नहीं छोड़ा था उनका तो झाड़ा ले लिया गया था। जरूरत के समय के लिए जिन पैसों को उन्होंने अपने पति और बच्चों से गुप्त रूप से बचा कर रखा था अब उनकी बचत के 500 और 1000 रूपये के नोट नोटबंदी के कारण रद्दी हो गये थे। लोग 500 रूपये और 1000 रूपये के अपने पुराने नोटों को बदलने के लिए दिन-दिन भर ठिठुरती सर्दी में बैंक और एटीएम की पंक्तियों में खाली पेट खड़े रहते थे। औरतें अपने दुधमुंहे बच्चों को लेकर एटीएम की पंक्तियों में मजबूरन खड़ी रहतीं ताकि घर खर्च के लिए वे बैंक के 2000 के नये नोट लें ले और जाकर अपने आवश्यक सामानों को खरीद सकें। कई लोग तो दिन निकलने से पहले ही बैंक की कतारों में खड़े हो जाते ताकि एटीएम से वह 2000 के नये नोट को अपने घर खर्च के लिए निकाल सकें। किसान अपने फल-सब्जियों को पच्चीस पैसे किलो में बेच रहे थे। हर तरफ अराजकता फ़ैल गयी थी। स्कूल जाने वाले बच्चे स्कूल जाना छोड़कर एटीएम की कतारों में खड़े थे। वह लोग जो रोज कमाते और रोज खाते हैं, उनकी आजीविका बुरी तरह से प्रभावित हो गयी थी क्योंकि उनके ग्राहक उनकी दुकानों पर आने की बजाय बैंक और एटीएम की कतारों में खड़े रहते थे। 150 से ज्यादा लोग बैंक और एटीएम की कतारों में खड़े-खड़े ही मर गये यह तो वह संख्या है जो कथित तौर पर अखबारों में दी गयी थीं मरने वालों की वास्तविक संख्या क्या है यह कोई नहीं जानता सिवाय उन लोगों के जो इन मौतों के जिम्मेदार हैं। भारत की कई बेटियों की शादियां टूट गयी जिस वजह से उन लड़कियों और उनके पिताओं ने आत्महत्या कर ली। अस्पतालों ने मरीजों को भर्ती करने से पहले यह पूछना शुरू कर दिया कि क्या भुगतान के लिए वे 2000 के नए नोट लाये हैं, और जिन मरीजों ने नये 2000 के नोट के जरिये भुगतान करने में अपनी असमर्थता जाहिर की, अस्पतालों ने उन मरीजों को भर्ती करने से मना कर दिया, उनका इलाज करने से मना कर दिया। छोटी कम्पनियां नोटबंदी में अपने निर्माण के लिए न ही कच्चा माल खरीद पा रही थीं और न ही माल तैयार करने के लिए अपने कर्मचारियों को भुगतान कर पा रही थीं, और जिन कम्पनियों के माल तैयार थे वह अपने माल को बेच नहीं पा रही थी इन सबका परिणाम यह हुआ कि इस नोटबंदी के कारण कितनी ही कम्पनियां और लघु उद्योग बंद हो गये, लाखों की संख्या में लोगों को उनकी नौकरी से निकाल दिया गया, नौकरी से निकाले गये इन लोगों को दुबारा कभी काम मिल पायेगा यह कहना मुश्किल है और तो और नोटबंदी के कारण पैदा हुए आर्थिक तनाव के कारण कई छोटी कम्पनियों के मालिकों की असमय मृत्यु भी हुयी थी। इस नोटबंदी ने लाखों बच्चों की पढ़ाई का एक साल बर्बाद कर दिया, और लाखों बच्चों ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। आम आदमियों की बात तो छोड़ो इस नोट बंदी ने सड़क पर आवारा टहलने वाले गाय-बैलों, कुत्तों तक को बहुत ही दयनीय स्थिति में पहुंचा दिया था नोटबंदी के कारण आम लोगों के पास पैसों की जिस तरह से किल्लत आ गयी थी उससे लोगों ने अपनी जरूरत की चीजों में भी खरीदारी कम कर दी थी, साफ़ शब्दों में कहा जाए तो लोगों ने फलों और सब्जियों की खरीद में जिस तरह से कटौती की थी उससे घर से निकलने वाला वह कचरा जिसे ये आवारा गाय-बैल खा लिया करते थे, वह भी इन गाय-बैलों को मिलना मुश्किल हो गया। इसके साथ ही नोटबंदी से पहले जो लोग अपने घरों के सामने इन जानवरों को खाने के लिए अतिरिक्त बचा हुआ बासी खाना डाल देते थे वह भी इन जानवरों को मिलना बंद हो गया। यह इस नोट बंदी का वह पहलू था जिसे शायद ही किसी ने गौर किया था।

समाज का कोई भी तबका ऐसा नहीं था जो इस नोट बंदी से प्रभावित न हुआ हो, रिक्शेवाले, ठेलेवाले, रोजी पर अपनी आजीविका कमाने वाले मजदूर, दुकानदार, किसान, आम आदमी, पशु पक्षी से लेकर भगवान तक इस नोट बंदी से प्रभावित हुए थे क्योंकि जिन लोगों को जरिये उन्हें आय की प्राप्ति होती थी वे सारे लोग तो बैंक की एटीएम की लाइनों में खड़े थे। यह बात हास्यास्पद लगती है परन्तु यह एक सच्चाई है कि नोटबंदी के समय में भगवान के मन्दिरों में यह सूचना टाँग दी गयी थी कि 500 और 1000 रूपये के बैंकों नोटों का लीगल टेंडर खत्म कर दिया गया है इसलिए भक्तजनों से आग्रह है कि वे इन नोटों को दानपात्रों में न डालें। भक्तजन दानपात्र में 2000 के नए नोट या प्रचलन में चल रहे नोटों को ही डालें। इस नोटबंदी में टेलीविजन पर बेचे जाने वाले कुबेर कुंजी और लक्ष्मी यंत्र जैसे यंत्र बिलकुल बेकार साबित हुए क्योंकि वे नोटबंदी के प्रभाव को निष्फल न कर सके। यही हाल बाकी के यंत्रों का भी था क्योंकि हनुमान रक्षा कवच जैसे यंत्र भी इस देश को नोटबंदी के संकट से नहीं उबार पाए थे। और देश के मन्दिरों में रह रहे सारे देवी-देवता प्रभावहीन हो गये थे। इस प्रकार इस नोटबंदी ने आदमियों, दूसरे जीवों और सदियों से सर्वशक्तिमान माने जा रहे देवी-देवताओं तक को बुरी तरह प्रभावित कर निरीह बना दिया था। इस नोटबंदी में जो विदेशी पर्यटक भारत भ्रमण के लिए आये थे, नोटबंदी के दौरान भारत में मिले अपने कटु अनुभवों को वे शायद ही कभी भुला पायेंगे।

वास्तव में नोटबंदी नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया ऐसा अपराध था जो किसी भी कीमत पर राष्ट्रद्रोह से कम नहीं है। जिसके लिए फांसी से कम कोई सज़ा हो ही नहीं सकती थी, और यह बात नरेंद्र मोदी खुद भी अच्छी तरह से जानता था तभी तो नोटबंदी के दौरान वह जापान भाग गया था और उसे यह डर लग रहा था कि भारत की जनता कहीं उसके द्वारा गैरकानूनी ढंग से की गयी इस नोटबंदी के लिए उसे मार ही न डाले, बावजूद इसके इस देश की जनता ने नोटबंदी के इस प्रहार को हंसते हुए अपने सीने पर लिया। कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी के नेतृत्व में लोगों को महात्मा गांधी के उस तरीके का अनुसरण करने के लिए प्रेरित किया जिससे महात्मा गांधी ने देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाई थी। और फिर पूरे देश भर में जगह-जगह पर लोगों ने, नरेंद्र मोदी की इस नोटबंदी को वापस लिए जाने के लिए, अपने स्तर पर नोटबंदी के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने शुरू कर दिये। नरेंद्र मोदी द्वारा थोपी गयी इस नोटबंदी की आपदा में देश का पूरा मीडिया देश की जनता के साथ खड़ा हो गया जान पड़ता था। केरल में हजारों की तादाद में लोगों ने मानवश्रृंखला बना कर शांतिपूर्ण ढंग से नरेंद्र मोदी द्वारा देश में की गयी इस नोटबंदी का विरोध किया। जिस तरह से पूरे देश में धरने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए थे उससे तो फौरन ही नोटबंदी वापस ले ली जानी चाहिए थी, परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ वस्तुतः नोटबंदी के इस प्रकरण से मेरे सामने इतिहास की एक सच्चाई अनजाने ही उजागर हो गयी और वह यह थी कि भारत को आजादी महात्मा गांधी के शान्तिपूर्ण धरनों, प्रदर्शनों, और रैलियों से तो बिलकुल भी नहीं मिली रही होगी अन्यथा महात्मा गांधी का शान्तिपूर्ण धरनों, प्रदर्शनों, और रैलियों का वह अस्त्र जो अंग्रेजों, जो कि भारतीय नहीं थे, के खिलाफ सफल हुआ था वह नरेंद्र मोदी, जो कि खुद एक भारतीय है, के खिलाफ विफल नहीं होता। मुझे लगता है इतिहासकारों ने भारत को मिली आजादी के वास्तविक कारणों को न लिख कर महात्मा गांधी द्वारा शान्तिपूर्ण धरनों, प्रदर्शनों, और रैलियों से आजादी दिलाने की बात सिर्फ यूं ही इतिहास के पन्नों को भरने के लिए और आने वाली पीढ़ियों को गुमराह करने के लिए लिखी है जबकि वास्तविकता में देश को आजादी किसी और ही कारण से और किसी और ही व्यक्ति की वजह से मिली रही होगी, परन्तु उस कारण और उस व्यक्ति का नाम, जिसकी वजह से इस देश को आजादी मिली थी, इतिहास में नहीं लिखा गया है।” नोटबंदी के दिनों को याद करते हुए मैंने कहा।

यह बात तो तुम बिलकुल सही कहते हो भाई, और नरेंद्र मोदी की इस नोटबंदी का सफल होना इसी बात की पुष्टि करता है।”

पिछले साल 8 नवम्बर 2016 को, देश पर थोपी गयी यह नोटबंदी भारत के इतिहास का वह काला अध्याय है जिसे यदि कायदे से दर्ज नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ी को इस नोटबंदी के बारे में कुछ वैसा ही झूठ इतिहास में पढ़ना पड़ेगा जैसा हम अभी भारत की आजादी को लेकर पढ़ते आये हैं।” मैंने अपनी बात आगे कहते हुए कहा, “हालांकि इस नोटबंदी को करने के पीछे दलील यह दी गयी थी कि इसका मकसद देश में छिपे काले धन को निकालना है। पर मुझे यह बात समझ में नहीं आती है कि मेहनत करके अपना पैसा जमा करने वाले लोगों के पास यह काला घन कहां से आ सकता है, आम जनता के पास कोई छापाखाना तो होता नहीं है कि जब जी चाहा जितना जी चाहा नोट छाप लिया; हकीकत यह है कि देश का सारा काला-पीला-हरा-गुलाबी धन देश के नेताओं के पास ही होता है, क्योंकि घोटाले ये नेता करते हैं, विदेशी बैंकों में खाते इन नेताओं के होते हैं, और लोगों के दिए गये टैक्स के पैसों से विदेशों में हनीमून ये नेता लोग मनाते हैं। बिना कुछ किये धरे इन नेताओं की पूरी जिन्दगी मौज-मस्ती और अय्याशियों में गुजरती है और ये कहते हैं कि देश का काला धन देश की मेहनतकश जनता के पास है। अरे इस नोटबंदी ने भी यही साबित किया है कि ये नेता जब चाहें लोगों की मेहनत से कमाए गये पैसों के मूल्य को शून्य कर दें और अपने सरकारी छापेखाने (आर. बी. आई.) से नये नोट छपवा कर खुद को धनवान बना लें। लोग तो मेहनत करते हैं फिर उस मेहनत के एवज में कुछ पैसे पाते हैं जबकि ये नेता छापेखाने में अपने नौकरों से कहकर अपने लिए जितना चाहें नोट छपवा कर अपने घरों और अपने बैंकों में जमा कर सकते हैं और उनके ऐसा करने पर उनसे यह पूछने वाला कोई नहीं है कि उन्होंने कितने पैसे छापकर इकट्ठा किये हैं। देश में हुयी नोट बंदी के बाद बैंकों में वापस जमा हुए रुपयों से भी यह बात साबित होती है कि इस देश की जनता का धन कोई काला धन नहीं है।”

तुम्हारी बात बिलकुल सही है भाई, सरकारी छापाखाना (आर. बी. आई.) नेताओं के पास है तो जाहिर सी बात है कि धन भी उनके और उनके करीबियों के पास ही होगा। इस बात की पुष्टि तो नोटबंदी के समय मुकेश अम्बानी जैसे उद्योगपति के घर में हुए भव्य जश्न और नितिन गडकरी जैसे नेता के घर में हुयी शाही शादी से ही होती है।”

नोटबंदी के मुद्दे को लम्बा खिंचते देखकर मैंने हमारी बातचीत का रुख बदलने की कोशिश करते हुए कहा, “नोटबंदी इतिहास की गुजरी हुयी बात है, इसे कुरेदने से क्या फायदा चलो हम किसी और मुद्दे पर बात करते हैं।”

किस मुद्दे पर?”

कोई भी दूसरा मुद्दा!”

कोई नया मुद्दा तलाशने के लिए हमें दूर नहीं जाना होगा। बस आज यानि 1 जुलाई 2017 का अख़बार उठाकर देख लो, तुम्हें नया मुद्दा मिल जाएगा।” मेरे भाई ने मुझे अख़बार थमाते हुए कहा।

अरे हां, आज से तो देश में GST (वस्तु और सेवा कर) लागू हो गया है। वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया जाना वाला यह टैक्स 28% तक हो सकेगा,” अपनी बात आगे कहते हुए मैंने कहा, “टैक्स से आये इन लाखों करोड़ों रुपयों का किया क्या जाता है यह बात मुझे समझ में नहीं आती, आये दिन खबरें सुनने में आती हैं कि ट्रेन की पटरियों की देखभाल न करने की वजह से ट्रेन पलट गयी और बहुत सारे लोग मारे गये, या फिर यह कि घटिया सामान लगाये जाने की वजह से उद्घाटन से पहले ही कोई पुल या बाँध ढह गया। ये नेता टैक्स वसूल करते समय तो यह कहते है कि टैक्स में आया हुआ पैसा देश के विकास में इस्तेमाल होता है परन्तु सच्चाई यह है कि इन पैसों को देश के नये निर्माण में तो छोड़ो देश में निर्मित हो चुके पुराने निर्माण के रखरखाव तक में ठीक ढंग से खर्च नहीं किया जाता है और पैसों का दुर्विनियोग किया जाता है।”

भाई, यह सब छोड़ो पहले यह बताओ तुम्हारी नजरों में इस टैक्स GST की उगाही किस हद तक उचित है?”

मैं कोई अर्थशास्त्री तो हूँ नहीं लेकिन जितना मैं टैक्स के बारे में समझता हूँ उतना मैं इसे बताने की कोशिश करता हूँ।” अपनी बात आगे कहते हुए मैंने कहा, “टैक्स का लिया जाना जरूरी है परन्तु इसे किसी व्यक्ति की आय पर अधिकतम 10% तक ही लगाया चाहिए उससे अधिक नहीं और इसके अलावा किसी से यदि कोई भी टैक्स किसी भी अप्रत्यक्ष तरीके से लिया जाता है तो वह सरासर लूट है। और हाँ जहां तक मुझे याद पड़ता है तुमने मुझे बताया था भारत के इतिहास का सबसे क्रूर मुसलिम शासक औरंगज़ेब भी जनता से 5% से ज्यादा टैक्स नहीं वसूला करता था।”

बिलकुल सही कहा भाई, औरंगज़ेब 5% टैक्स वसूला करता था और यह टैक्स व्यक्ति की आय पर लिया जाता था न कि व्यय पर। शासन द्वारा अपने खर्चों की भरपाई के लिए किसी आदमी की आय पर 5-6% प्रत्यक्ष कर लगाने की बात उचित समझी जा सकती है लेकिन अप्रत्यक्ष तरीके से किसी आदमी के व्यय पर टैक्स थोपना बिलकुल भी अनुचित है; किसी व्यक्ति से उसके व्यय पर टैक्स की उगाही करना लूट को विधिक जामा पहनाने वाली बात है। क्योंकि यह बात तो हम सभी जानते हैं कि आदमी की आय हो या न हो उसके व्यय जरूर होते हैं। ऐसी स्थिति में इस बात पर विचार करो कि कोई बिना आय का आदमी अपनी जरूरतों के लिए यदि कोई वस्तु खरीदता है या कोई सेवा लेता है तो जाहिर सी बात है कि उस वस्तु या सेवा के लिए उसने अपनी बचत के पैसों को खर्च किया है और अब तुम्हीं बताओ भाई किसी आदमी की बचत के पैसों पर इस प्रकार से टैक्स लिया जाना कहां से उचित है।

एक और बात भाई जब से देश आजाद हुआ है इसकी आबादी भी बढ़ी है और आबादी के साथ ही नौकरीपेशा लोगों की संख्या भी बढ़ी है ऐसे में देश की आजादी के समय जितना टैक्स सरकार को प्रत्यक्ष-कर के रूप में मिलता रहा होगा इस समय उससे कई गुना ज्यादा प्रत्यक्ष-कर सरकार को अब मिलता है ऐसे में अब जनता पर अप्रत्यक्ष-कर थोपने का कोई औचित्य मुझे समझ में नहीं आता है। देश के नेता, लोगों पर नये-नये टैक्स थोपने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं पर वे यह भूल जाते हैं कि कोई आदमी जो प्राइवेट काम करता है उसकी आय से स्त्रोत सीमित होते हैं जब भी यह टैक्स थोपा जाता है तो इससे उस व्यक्ति के आजीविका चलाने के संसाधन में कोई बढ़ोत्तरी नहीं होती है, टैक्स के बढ़ाए जाने से उस आम गैर सरकारी आदमी की आय इन नेताओं की आय की तरह बेहिसाब नहीं बढ़ती है बल्कि यह तो उसके सीमित साधनों से होने वाली सीमित आय पर एक करारी चोट करता है, उसे दिन–प्रतिदिन आर्थिक रुप से कमजोर बनाता है। जिस वजह से बढ़े हुए टैक्स के कारण आई महंगाई में उसे अपने खर्चों की भरपाई के लिए मजबूरन ऐसे काम करने पड़ते हैं जिससे भ्रष्टाचार और मिलावट जैसे अपराधों को बढ़ावा मिलता है। जब तक इस देश और दुनिया में अप्रत्यक्ष-कर नहीं लिया जाता था तब तक खाने-पीने की चीजों को आदमी निश्चिंत होकर खरीद सकता था लेकिन सरकार में बैठे नेताओं ने जब से अपने निजी खजानों को भरने के लिए जनता पर यह अप्रत्यक्ष-कर लगाना शुरू किया है और इसमें इजाफा किया है तब से लगातार खाने-पीने की चीजों में मिलावट बढ़ी है। अप्रत्यक्ष-कर, अप्रत्यक्ष होता है इसलिए इसका कहीं कोई हिसाब-किताब नहीं होता है यह सिर्फ और सिर्फ जनता से अप्रत्यक्ष तरीके से ज्यादा से ज्यादा उगाही करने के लिए होता है और इससे जमा होने वाले पैसे का उपयोग ये नेता लोग अपने निजी रागरंग और हनीमून के लिए इस्तेमाल करते हैं। देश को आजाद हुए सत्तर साल हो गये हैं लेकिन इन नेताओं का यह राजकोष हमेशा खाली ही रहता है जबकि लगातार हर साल इनके राजकोष में कितने लाख करोड़ धन इकट्ठा होता है इसका कभी कोई हिसाब नहीं दिया जाता है। देश में कोई आपदा आती है, या कहीं बाढ़ आती है तो ऐसे अवसरों पर भी यह नेता राहत कोष के नाम पर पैसे मांगने से नहीं चूकते हैं अरे मैं पूछता हूँ इन्होंने जो पैसा वर्षों से टैक्स के रूप में इकट्ठा किया था यह उसे उस आपदा या बाढ़ के समय में खर्च क्यों नहीं करते हैं, इनका टैक्स कलेक्शन तो हर साल कई लाख करोड़ का होता है, ऐसे में उस आपदा या बाढ़ से निपटने के लिए कुछ हजार करोड़ रूपये ही तो खर्च होंगे जिसके लिए इन्हें जनता से गुहार करने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन फिर भी ये जनता से राष्ट्रीय आपदा के नाम पर पैसे मांगते हैं क्यों? इस बात का है कोई उत्तर तुम्हारे पास।...खैर छोड़ो असली सवाल यह है कि नोटबंदी में जिस तरह से लाखों लोग बेरोजगार हुए हैं उन्हें देखकर क्या तुम्हें यह लगता है कि GST से उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार होगा या इससे उन लोगों की स्थिति और भी बदतर होगी?” मेरे भाई ने कहा।

नोट बंदी ने जिस तरह से लाखों आदमियों से उनका रोजगार, उनकी आय के स्त्रोत को छीन लिया है उसके बाद देश में लगाये गये इस GST से देश की आर्थिक स्थिति में कैसे सुधार होगा और लोगों के जीवन में कैसे खुशहाली आएगी यह बात तो शायद की कोई अर्थशास्त्री स्पष्ट कर सकता है। फिलहाल प्रथमदृष्टया देखने पर ही यह स्पष्ट है कि यह GST उन लोगों के लिए कोढ़ में खाज होने जैसा है जिनका रोजगार उनसे छिन गया है। अरे बेरोजगार हुए लोगों की बात तो छोड़ो बाकी का आम जनमानस भी GST से अपने रोजमर्रा के आवश्यक खर्चों में भी कटौती शुरू कर देगा जिसका परिणाम यह होगा कि यदि कोई निर्माता और सेवा प्रदाता कोई सामान बनाता है या कोई सेवा प्रदान करता है तो यह जरूरी नहीं है लोग उसके सामान या सेवा को लें, लोग मुश्किल से ही उन चीजों को खरीदेंगे जिनकी उन्हें जरूरत होगी। इस तरह से यह GST दो तरह से उद्योग धंधों और सेवाओं के लिए हानिकर है पहला यह कि यह टैक्स के रूप में निर्माता या सेवाप्रदाता को सीधे चोट पहुंचाता है क्योंकि वे निर्माता भी निर्माण के लिए सामान खरीदते हैं और उस सामान की खरीद पर GST देते हैं और दूसरा यह कि उस निर्माता या सेवा प्रदाता के तैयार माल को खरीदने में लोग कटौती करेंगे तो यह बात भी उस निर्माता या सेवा प्रदाता के प्रतिकूल ही जायेगी। GST से देश के निर्माताओं और सेवा प्रदाताओं की कमर ऐसे टूटेगी की वे भारत में पैसा लगाने और उद्यम करने के बारे में सपने में भी नहीं सोचेंगे। इससे नए उद्यमों के शुरू होने की बात तो छोड़ो जमे जमाए उद्यम भी बुरी तरह से प्रभावित होंगे और मजबूरन उन्हें अपने कामगारों और कर्मचारियों की छटनी करनी पड़ेगी। और इसका परिणाम यह होगा कि अभी जिन लोगों के पास रोजगार है वे भी बेरोजगार हो जायेंगे। ज्यों-ज्यों बेरोजगारी बढ़ेगी वैसे-वैसे लोगों की खरीदने की क्षमता गिरती चली जायेगी और वैसे-वैसे उद्योग धंधे बंद होते चले जायेंगे, और फिर मिलावट, भ्रष्टाचार, चोरी छिनैती जैसे अपराध बढ़ते चले जायेंगे। ...चलो फिलहाल के लिए हम लोगों ने इस मुद्दे पर भी काफी विचार-विमर्श कर लिया है, अब हम बाकी बातों को भविष्य पर छोड़ते हैं और देखते हैं कि इस नोटबंदी और GST का प्रत्यक्ष प्रभाव क्या होता है।” यह कहते हुए मैंने हमारी बातचीत खत्म की।

देश में GST के लागू होने के बाद कुछ और दिन बीत गये। कुछ राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने GST का हल्का-फुल्का दिखावटी विरोध किया था और फिर इस विरोध की बात आई गयी हो गयी, और जुलाई-अगस्त में ही अख़बारों में यह खबर छपी की GST के लागू होने के बाद से स्कूलों ने अपनी फीसों को काफी बढ़ा दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि लाखों बच्चों ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, यह होना स्वाभाविक ही था क्योंकि नोटबंदी में जिस तरह से लाखों लोग बेरोजगार हुए थे उनके लिए अपने खर्चों को ही निकल पाना मुश्किल हो रहा था और ऐसे में इस GST के कारण बच्चों की बढ़ी हुयी फीस को दे पाना उनके लिए असंभव हो गया। इस प्रकार ‘शिक्षा के मौलिक अधिकार’ को एक ‘लक्ज़री आइटम’ बनते हुए मैंने देखा। इतना सब होने पर भी देश में लगाये गये इस GST का विरोध इसलिए भी नहीं किया गया था क्योंकि इससे पहले नोटबंदी में लोगों के विरोध और प्रदर्शनों का कोई नतीजा नहीं निकला था, साथ ही यह कि इस समय नरेंद्र मोदी और उसके सहयोगियों की तरफ से लोगों को मोबाइलों पर और संचार माध्यमों से यह संदेश भेजा जा रहा था: “सरकार ने बैंक में नया खाता खोलने के लिए आधार को अनिवार्य बना दिया है। और पुराने बैंक खातों को 31 दिसम्बर 2017 से पहले आधार से जोड़ना अनिवार्य है अन्यथा सारे खातों को अविधिमान्य घोषित कर दिया जाएगा” ऐसे में नोटबंदी के कारण अधमरे हो चुके देश के लोग, जो चारों तरफ से आर्थिक समस्याओं से घिरे हुए थे, इस संदेश के मानसिक उत्पीड़न से इस तरह ग्रसित थे कि उन्होंने इस GST का विरोध नहीं किया।

नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी और GST लागू करके देश को जिस गति से डेवलपमेंट की राह पर सरपट दौड़ा दिया था, उसका परिणाम नोटबंदी में लोगों की मौत, लाखों लोगों की बेरोजगारी, लाखों बच्चों के साल बर्बाद होने और उनके शिक्षा से विमुख होने के रूप में नजर आया था इन चीजों का जिक्र करना जरूरी है इसलिए मैंने इन्हें यहाँ लिखा है।

जुलाई के महीने की दूसरी महत्वपूर्ण खबर जो अखबारों में आई थी वह यह थी कि सुप्रीम कोर्ट में, गोपनीयता से जुड़े सवालों को लेकर, आधार पर बहस शुरू हो गयी थी, और 19 जुलाई 2017 से सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय पीठ ने इस विषय पर सुनवाई शुरू कर दी थी कि क्या निजता का मौलिक अधिकार है या नहीं। इस सुनवाई का सकारात्मक परिणाम पाने के लिए देश की जनता और हम लोगों को ज्यादा लम्बा इंतजार नहीं करना पड़ा और अगस्त का महीना उस समय एक राहत देने वाला महीना साबित हुआ जब 24.08.2017 को आधार मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय पीठ ने यह घोषित किया कि “निजता का अधिकार जीवन के अधिकार, संविधान के भाग 3 अनुच्छेद 21, का मूलभूत भाग है।”

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से हम सभी देशवासियों ने राहत की सांस ली थी, ऐसा प्रतीत होने लगा मानो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने लोगों को आधार के खतरनाक चंगुल से बचा लिया था। राजनीतिक दलों के नेताओं ने, बड़े अभिनेताओं ने और जनसामान्य के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के आधार मामले में दिए गये निर्णय की बढ़-चढ़कर सराहना की और अख़बारों ने भी इन नेताओं और अभिनेताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट की सराहना के कहे गये वक्तव्यों को छापा, हम लोग भी आधार मामले में आये सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से खुश थे कि चलो देश पूरी तरह से बर्बाद होने से बच गया।

लेकिन आधार मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाने का मतलब यह नहीं था कि आधार को लोगों के बैंक खातों से जुड़ा कर लोगों के बैंकखातों में हेराफेरी करने की फिराक रखने वाले लोग चुप हो जाते खासकर तब जब उन्हें अपनी दो योजनाओं नोटबंदी और GST में सफलता मिल चुकी थी। इन लोगों को यह बात हजम नहीं हो पा रही थी कि सुप्रीम कोर्ट ने किस तरह से उनकी आधार योजना पर पानी फेर दिया था, इसलिए प्रधानमंत्री के पद का एक बार फिर से दुरुपयोग करते हुए नरेंद्र मोदी ने रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया के गवर्नर उर्जित पटेल के साथ मिलकर दीपावली धमाका किया अख़बार में यह खबर छपवा दी कि आधार को बैंक खातों से 31.12.2017 से पहले जुड़वाना अनिवार्य है। और लोगों की दीपावली ठीक तरह से बीती भी नहीं थी कि एक बार फिर से आधार मुद्दे ने तूल पकड़ लिया था।

सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई नये सिरे से फिर से शुरू हो गयी थी, बस अंतर केवल इतना था कि इस बार पाँच सदस्यीय पीठ आधार से जुड़े मामले को सुन रही थी और कोर्ट के सामने सरकार की तरफ से यह दलील पेश की गयी थी कि आधार एक लोक-कल्याणकारी योजना है इसका उद्देश्य सभी लोगों को आधार से जुड़े लाभों को प्रदान करना है इसलिए वह मोबाइल के माध्यम से संदेश भेजकर लोगों को अपने बैंकों के खातों से आधार को जुड़वाने के लिए (धमकी भरे) संदेश भेज रही है। एक बार फिर से हम सभी देशवासी अधर में लटक गये और सुप्रीम कोर्ट का मुंह ताकने लगे, कभी-कभी अख़बारों में यह खबर छप जाती कि मामले में प्रगति करते हुए कोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख दे दी है। इससे ज्यादा और कोई प्रगति मामले में दिखाई नहीं दी थी।

हालांकि अक्टूबर का महीना खत्म होने को आया था लेकिन अभी तक बैंकिंग लोकपाल को भेजी गयी मेरी शिकायत का मुझे कोई जवाब नहीं मिला था मगर बैंक की तरफ से मेरे किसी भी बैंकिंग ट्रांसएक्शन के काम में कोई अड़चन पैदा नहीं की गयी थी, यह मेरे लिए एक बड़ी बात थी परन्तु मोबाइल पर अभी भी बैंकों की तरफ से यह संदेश भेजे जा रहे थे कि “सरकारी निर्देशानुसार बैंक खातों को 31.12.2017 से पहले आधार से जुड़वाना अनिवार्य है अन्यथा बैंकिंग सेवा बंद कर दी जायेंगी” और तो और इसी बीच इस प्रकार से मोबाइल कंपनियों की तरफ से भी लगातार यह संदेश भेजे जाने शुरू कर दिए गये थे कि सरकारी निर्देशानुसार अपने मोबाइल नम्बर को आधार से जुड़वाना अनिवार्य है अन्यथा मोबाइल सेवा बाधित कर दी जायेगी।

इस बार नरेंद्र मोदी द्वारा आधार को माध्यम बनाकर पैदा की गयी समस्या को लेकर देश के सभी आम लोग कैसा महसूस कर रहे थे, यह बता पाना मेरे लिए मुश्किल है क्योंकि सभी लोग लगभग चुप ही थे इस बार न ही मीडिया और न ही कोई नेता इस बारे में चर्चा कर रहा था। हाँ कभी-कभार यह खबरें अखबारों में देखने-सुनने में जरूर आ जाती थीं कि कुछ लोगों, जिनके बैंक खाते आधार से जुड़ गये थे, के खातों से पैसों की चोरियां हुयी थीं पर इससे ज्यादा कोई प्रगति आधार मामले में देखने को नहीं मिली थी।

अक्टूबर के बाद नवम्बर का महीना भी खत्म होने को आया था, आधार मामले में साधी गयी चुप्पी किसी के लिए चिंता का विषय रही हो या न रही हो परन्तु अब वह कम से कम मेरे और मेरे घर के बाकी लोगों के लिए चिन्ता का सबब जरूर बन गयी थी क्योंकि मोबाइल पर बैंकों और मोबाइलों कम्पनियों द्वारा जिस प्रकार से आधार को लेकर संदेश प्रसारित किये जा रहे थे उससे हम लोगों का मानसिक उत्पीड़न और तनाव काफी ज्यादा बढ़ गया था क्योंकि एक तो 31.12.2017 की तारीख निकट आ रही थी दूसरे मोबाइल पर भेजे जाने वाले इन संदेशों का धमकी भरा लहजा इस बात को पुष्ट करता था कि आधार निश्चित रूप से एक फ्रॉड स्कीम है, वैसे भी हम लोगों ने अखबारों में यह खबरें देख ली थीं कि कुछ लोगों, जिनके खाते आधार से जुड़े थे, के बैंक खातों से पैसे चोरी हुए थे, इसलिए यह बात हमें अच्छी तरह से समझ में आ गयी थी कि अगर आधार का किसी लोककल्याणकारी योजना से वास्तव में कोई लेना-देना होता तो हम लोगों को ऐसे धमकी भरे संदेश कभी न भेजे जाते।

दिसम्बर का महीना शुरू होने के साथ ही हम लोगों की बेचैनी और भी बढ़ गयी थी और हालात यह थे कि अब तो रात के समय, जब हम लोग सो रहे होते उस समय भी मोबाइल पर बैंकों और मोबाइल कम्पनियों की तरफ से आधार को जुड़वाने के सन्देश आने लगे थे। हर सुबह जब मैं उठता तो मैं इसी उम्मीद से अख़बार देखता था कि शायद अख़बार में कोई ऐसी खबर छपी हो जो आधार के कारण पैदा हुए इस मानसिक उत्पीड़न से हमें निजात दिलाये। इसी उम्मीद से, सुबह उठने के बाद जब मैंने 06.12.2017 के अख़बार को देखा तो पाया कि अख़बार में कोई भी ऐसी खबर नहीं थी जिसे राहत देने वाला कहा जा सके इसलिये अनमना होकर मैं अख़बार को एक तरफ कोने में रख ही रहा था कि तभी मेरे भाई ने आकर मुझसे कहा, “क्यों भाई, क्या अख़बार में कोई ख़ास खबर छपी है जो हम लोगों के काम की है।”

नहीं।” मैंने जवाब दिया, “बस चुनावी खबरें और नेताओं की फालतू बयानबाजी ही छपी है, जिसका कोई मतलब नहीं है।”

कोई बात नहीं, जानते हो आज रात मैंने एक सपना देखा है और जिस प्रकार से यह सपना मुझे दिखा है उसे देखकर मुझे लगता है यह सपना जरूर सच हो जाएगा।”

क्या सपना देखा है तुमने?” मैंने पूछा।

भाई मैंने सपने में देखा कि कोई मुझसे कह रहा है कि किसी का मुंह ताकने से कुछ नहीं होने वाला है, यदि मैंने कुछ नहीं किया तो कोई कुछ नहीं करेगा, इस आधार मामले को यदि मैंने खत्म नहीं किया तो सब कुछ खत्म हो जाएगा और फिर इस देश को तबाह होने से कोई नहीं रोक पायेगा।”

हो सकता है यह सपना तुम्हें इसलिए आया हो क्योंकि आजकल रात-दिन, वक्त-बेवक्त किसी भी समय मोबाइल पर बैंकों और मोबाइल कम्पनियों द्वारा आधार को बैंक खाते और मोबाइल से जुड़वाये जाने के बारे में संदेश भेजे जा रहे हैं।” मैंने कहा।

तुम्हारी बात सही हो सकती है, भाई परन्तु मुझे इस सपने में सच्चाई दिखाई देती है। नोटबंदी का प्रकरण हुए अभी बहुत समय नहीं हुआ है उस समय भी न ही किसी नेता ने और न ही कोर्ट से ऐसा कुछ किया था जिससे इस देश में हुयी नोटबंदी वापस ले ली गयी होती, उस समय भी लोग कितने परेशान थे क्या वह सब तुम भूल गये हो। अब समय आ गया है जब हम हाथ-हाथ पर धरे नहीं बैठ सकते हैं। नोटबंदी के समय देश के ये कर्णधार नेता यदि चाहते तो नरेंद्र मोदी, उर्जित पटेल और अरुण जेटली को उनके द्वारा की गयी गैरकानूनी नोटबंदी के लिए उन्हें त्यागपत्र देने के लिए विवश कर सकते थे, लेकिन उस समय संसद में नोटबंदी पर इन नेताओं ने बढ़-चढ़ कर हंसी-ठिठोली की थी, और कुछ भी ऐसा नहीं किया था जिससे इस नोटबंदी को वापस ले लिया जाता। रही बात कोर्ट की सक्रियता की तो मैं मानता हूँ कुछ नये वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में नोटबंदी के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल की थी, लेकिन देश के बहुत ही दिग्गज वकील कपिल सिब्बल साहब ने बीच में कूदकर मामले में पता नहीं क्या दलीलें पेश की थीं कि मामले में कोर्ट का फैसला आना तो दूर की बात कोर्ट का ‘स्टे’ तक नहीं मिला था। और फिर देश की जनता और हम सभी को नोटबंदी को झेलने के लिए विवश होना पड़ा था, अगर उस समय किसी ने सार्थक ढंग से कुछ किया होता तो देश को नोटबंदी की त्रासदी न झेलनी पड़ती।”

कह तो तुम बिलकुल सही रहे हो, नरेंद्र मोदी की नोटबंदी ने जिस तरह से लोगों को मानसिक तनाव और शारीरिक कष्ट दिए, बेहिसाब लोगों की जानें लीं, लाखों लोगों को बेरोजगार किया, लाखों बच्चों के साल को बर्बाद किया और कितने ही उद्योग धंधों को बंद होने के लिए विवश कर दिया उसे देखने के बाद तो निश्चित तौर पर यह स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी और उसके सहयोगियों द्वारा आधार के नाम पर जिस प्रकार से हम लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है, हमारा मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा है उसे देखकर यह नहीं लगता है कि आसार अच्छे हैं... वैसे, मैंने पढ़ रखा है कि हमारा अवचेतन मस्तिष्क कई अवसरों पर हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में पूर्वाभास करा देता है, ऐसी स्थिति में जैसा तुम बता रहे हो बहुत संभव है कि यह ईश्वरीय प्रेरणा ही हो जिसने तुम्हारे अवचेतन मस्तिष्क के जरिये तुम्हें आगाह किया हो, इसलिए इस समय यदि तुम आधार के खिलाफ खड़े होते हो तो चाहे तुम अकेले ही क्यों न हो ईश्वर तुम्हें सफलता जरूर देगा।” फिर अपनी बात आगे कहते हुए मैंने कहा, “लेकिन अब तुम करोगे क्या?”

बैंक खाते और मोबाइल को आधार से जुड़वाने के लिए धमकी भरे संदेश भेज कर हम लोगों का मानसिक उत्पीड़न करने के लिए मैं इन लोगों को लीगल नोटिस भेजूंगा!”

क्या??”

हां बड़े भाई मैं नरेंद्र मोदी, मनोज-सिन्हा[5] और उर्जित पटेल को लीगल नोटिस भेजूंगा।” मेरे भाई ने दृढ़ता के साथ कहा। “और इन लोगों को यह नोटिस मैं आज ही लिखूंगा। और स्पष्ट रूप से उन्हें अपनी नोटिस के जरिये यह बता दूंगा कि इस बार ये लोग सरकार की आड़ में बच नहीं पायेंगे क्यों यह नोटिस मैं उनको वैयक्तिक हैसियत में सम्बोधित करते हुए भेजूंगा ताकि यदि मुकदमा लड़ने की नौबत आती है तो यह वाद एक जनहित याचिका नहीं वरन व्यक्ति बनाम व्यक्ति वाद के रूप में दाखिल हो ताकि कहीं से भी मामले में लीपापोती के किये जा सकने की कोई भी गुंजाइश न रहे।”

यह तुमने बिलकुल सही सोचा है, भले ये लोग कितने भी बड़े पदों पर क्यों न बैठे हों, परन्तु हैं तो वे भी इसी देश के नागरिक ही, इसलिए वैयक्तिक हैसियत में उन्हें नोटिस भेजने का तुम्हारा निर्णय बिलकुल सही है।” मैंने अपनी बात आगे कहते हुए कहा, “वैसे इतने बड़े लोगों को वैयक्तिक हैसियत में दायी बनाकर नोटिस भेजने वाले इस देश के तुम पहले वकील होगे, इसलिए तुम इन लोगों से इस नोटिस की फीस और वाद-शुल्क के रूप में कितनी रकम का दावा करोगे?”

मेरे चेहरे पर आते हंसी के भाव को देखते हुए मेरे भाई ने थोड़ी देर विचार करने के बाद कहा, “भाई बात तो तुम ठीक कह रहे हो, नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव प्रचार में कहा था कि अगर उसकी सरकार बनती है तो हर एक नागरिक के खाते में 15-20 लाख रुपये यूं ही आ जायेंगे, भाई तुम तो जानते ही हो कि मैं यूं ही खैरात में पैसे लेने वालों में से नहीं हूँ इसलिए अपनी इस नोटिस को लिखने में की गयी मेहनत के लिए मैं नोटिस की फीस के रूप में 15 लाख रुपये की मांग करूंगा और रही बात वादशुल्क की तो क्योंकि यह कोई मामूली मुकदमा नहीं होगा बल्कि एक ऐसा मुकदमा होगा जिससे इस देश की 133 करोड़ जनता का भविष्य प्रभावित होगा, इसलिए वाद-शुल्क की कीमत मेरी राय में 133 करोड़ रूपये से कम नहीं होनी चाहिए।”

यह तुमने बहुत सही सोचा है, वैसे भी ये बहुत ही नामी-गिरामी पैसेवाले लोग हैं, इसलिए यदि तुम इससे कम की राशि का जिक्र अपनी नोटिस में करते हो तो उलटे इन लोगों को लगेगा कि तुम इनकी औकात को कम आंक रहे हो और फिर बहुत संभव है कि वे तुम्हारी नोटिस को गंभीरता से न लें।” मैंने कहा।

इसके बाद मेरे भाई ने लीगल-नोटिस[6] तैयार की और इस नोटिस को मुझे दिखाते हुए कहा, “भाई, वकालत करने का तुम्हें ज्यादा अनुभव है इसलिए मैं चाहूंगा कि तुम इस नोटिस को एक बार देखकर चेक कर लो, यदि इसमें कोई बात रह गयी हो या किसी बात को लिखने में मुझसे चूक हुयी हो तो तुम उसमें सुधार कर दो।”

मैंने नोटिस को चेक किया और फिर इसे वापस अपने भाई को देते हुए मैंने कहा, “वाकई तुमने ऐसी बेहतरीन नोटिस लिखी है जिसे भारत के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं लिखा गया है।”

07.12.17 को मेरे भाई ने नरेंद्र मोदी, मनोज सिन्हा और उर्जित पटेल को वैयक्तिक रूप से दायी बनाते हुए रजिस्टर्ड डाक से लीगल नोटिस भेज दी।

08.12.17 यानि अगले दिन ही अख़बार में अरुण जेटली ने इस बात के संकेत दिए कि आधार से बैंक खातों को जोड़े जाने की तारीख 31 दिसम्बर 2017 से आगे बढ़ाकर 31 मार्च 2018 की जा सकती है।

फिर 14.12.17 को अख़बार में तफसील से यह खबर छपी कि आधार से बैंक खातों और मोबाइल नंबरों को जोड़ने की अंतिम तिथि को 31 दिसम्बर 2017 से आगे बढ़ाकर 31 मार्च 2018 कर दिया गया है।

जब मैंने यह खबर अख़बार में पढ़ी, तो मैंने अपने भाई से कहा, “तुम्हारी भेजी गयी लीगल नोटिस का असर यह हुआ है कि फिलहाल के लिए आधार से बैंक खातों और मोबाइल नंबरों को जोड़ने की अंतिम तिथि को 31 दिसम्बर 2017 से आगे बढ़ाकर 31 मार्च 2018 कर दिया गया है।”

मैंने अख़बार में छपी खबर अपने भाई को तो बता दी थी लेकिन इस खबर को पढ़ने के बाद मेरे जेहन में यह बात आई थी कि नोटिस के भेजे जाने के अगले ही दिन जिस प्रकार अचानक ही यह खबर अख़बार में छपी थी कि अरुण जेटली ने आधार से बैंक खातों को जोड़ने की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2017 से आगे बढ़ाकर 31 मार्च 2018 किये जाने की संभावना जताई थी, और यह कि फिर 14.12.17 को अख़बार में तफसील से इस खबर का छपना कि आधार से बैंक खातों और मोबाइल नंबरों को जोड़ने की अंतिम तिथि को 31 दिसम्बर 2017 से आगे बढ़ाकर 31 मार्च 2018 कर दिया गया था—ये दोनों ही बातें दिखाती थीं कि आधार से जुड़ा यह मामला इतनी आसानी से सुलझने वाला नहीं था।


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